Posted: November 19, 2015 in Uncategorized

Today I met “love”, i can’t tell you much about him, because I myself don’t know much, all I know is that he might not survive long, when I saw him this morning he was on a hospital bed, struggling with a rare infection after a Leg fracture. He must have been in his teens but I found the teenager inside him already dead. There was no zeal, no enthusiasms, no aspirations, all that I saw in his eyes was fear and helplessness. He was in grief, grief about him being a victim, victim of what? I can’t say, maybe the hospital that mishandled his fractured leg, or that drunk biker who hit him on the road or that infection itself. It can be anything. Because of the accident he missed to collect his first salary, I am sure he must have not been the same ‘love’ whom I saw today, he must have been excited to get his first salary, might have made plans to treat himself or to buy a gift for her mother. The salary which can’t Buy him a day medicines, could have bought him so much of happiness but the reality of his life has changed overnight and he has fair understanding of this cruel reality. As I was leaving him I witnessed him pleading to the doctor to save his life. Since the time I left work, everything reminded me of him, all the cars, the roads, the traffic, everything kept bringing back his face to me, I feel failed as a part of the system which couldn’t provide ‘love’ safer roads to walk or proper medical care. Helplessness of his voice is still echoing my ear. Today I couldn’t dare to crib about anything, I hugged my loved ones even tighter.
I don’t know ‘love’ if I will ever see you again” but i hope you fightback. 18/11/2015


Why so many Indians and Indian government is in so much of pain with the documentary “India’s daughter”, the answer to this question lies in the very title of the documentary. Though being a daughter or say women has never been easy In any part of the world but being India’s daughter is an especial privilege because even to take birth as one she needs to be more fortunate than one million of our daughters whom we kill annually even before they take birth, for those who take birth our preferential treatment to our daughters continues by giving millions of them exclusive privilege in sex slavery, ritual sex slavery, bride trafficking and by ensuring their higher participation in bonded labor, beggary, domestic servitude (90%) and human organ harvesting, for those of our luckier daughters who fortunately misses any of these we still have ensured a very high school drop out rate (63.5%) higher malnutrition rate , the length of our discrimination towards our daughters goes up to immunization. One would and should wonder how can our national pride get hurt by a documentary made by a foreign national when this is how we treat our daughters, its the expose of the typical mindset of a larger bunch of our male dominant society what has made this documentary so controversial, sad but no surprise that the comments of the rapist and the two lawyers resemble in their approach towards women, I have seen many people wondering why would any lawyer would want to fight the case for such rapists who have already committed their brutal and heinous crime, this is their answer, a rapist mentality sympathizes another rapist but this has also exposed how a large section of our society think of women it’s worth notable to go through their comment one of the pervert lawyer said that a women is like a flower, like a diamond needs to be protected so that it doesn’t get dirty the metaphor used by this law practitioner reveals of the mentality of large amount of people who think women is a shiny glittery precious toy meant for safekeeping so can be used later to satisfy the ego of male to have sex with a virgin, the second disgraceful lawyer commented that he would prefer to burn her daughter in his farm if she goes out with a male friend, unfortunately horrific person who is threatening to act a crime on camera is also a law practitioner , ironical that instead of him being seen and convicted for public ally challenging and threatening the liberty of entire section of women, our government has chosen to ban the documentary. The Delhi police filed a FIR on 3rd March against the filmmakers under several section of Indian penal code such as section 504 (intent to provoke breach of the peace), dear government, we need to breach the peace that is peacefully tolerating the harassment of our women since ages, section 505(1)(b) (With intent to cause fear or alarm to the public), oh the system we do need to be alarmed on how we treat our women, section 509 (Word, gesture or act intended to insult the modesty of a woman) pity of such law which think this documentary has words and gesture to insult the modesty of a woman, it’s the same system that fails to protect the modesty of thousands of women on road every day but ensures that  rapists who have already committed their crime will still get multiple chance of prolonging or getting forgiven his much deserved punishment, and will be living secured life in jail till then with the tax money of victims family. What can be a bigger shame to all of us that our law has to protect the identity of rape victims because as a society all we give to our brave daughters who go through such extreme traumatic experiences is further ill treatment. In the end lets be happy that Jyoti Singh that courageous innocent victim died before having to see this justice to her by our law, our government and our society.

23 मार्च है शहीद दिवस आज सुबह से ही फ़ेसबुक में शहीद दिवस के नायक को लाइक मिल रहे हैं, मिलने भी चाईए, 1923 में लाहौर के नॅशनल लॉ कॉलेज के एक छात्र ने अपने पढ़ाई, घर, धर्म सब इसलिए छोड़ा था की शहीद होने के लगभग 83 साल बाद किसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर उसे खूब सम्मान मिले अब उस सम्मान की भी हालत देख लेते हैं, फ़ेसबुक में भगत सिंह के बारे में सबसे ज़्यादा लाइक्ड पेज में उनकी ज़िंदगी के बारे में कोई भी जानकारी नही है, पूरे फ़ेसबुक में 0 लाइक से लेकर दस लाख से ज़्यादा लाइक रखने वाले लगभग 73 पेज भगत सिंह को समर्पित हैं जिनमे से किसी में उनका प्रोफेशन पॉलिटीशियन बताया गया है तो किसी में भगत सिंह काल्पनिक किरदार मतलब फिक्षनल कॅरक्टर हैं| वलदमिर लेनिन, कार्ल मार्क, लियोन ट्रोट्स्की को पढ़ने वाले भगत सिंह ने यूं तो जीते जी कम्यूनिस्ट पार्टी से कोई नाता नही रखा पर एक फ़ेसबुक पेज में कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया से उनके संबंध काफ़ी अच्छे दिख रहे हैं, भगत सिंग कहीं चाय पर चर्चा कर रहे हैं तो कहीं बिजली का तार जोड़ते मनीष सिसोदिया और स्टील का ग्लास लिए बैठ अरविंद केजरीवाल के फोटो शेयर कर रहे हैं|एक पेज में तो भगत सिंह एक धर्म विशेष का प्रमोशन करते दिख रहे हैं जबकि असल ज़िंदगी में भगत सिंह नास्तिक थे| आज जब से आँख खुली है तब से अध्यन कर रहा हूँ दुख की बात है की इन सारे पेजो में मुश्किल से कहीं भी भगत सिंह के किसी भी विचार या संदेश का ज़िक्र मिला  भगत सिंह द्वारा अपनी ज़िंदगी के दौरान लिखे गये तमाम लेख, जेल के अंतिम दिनो में 404 पन्नो की बनाई उनकी डाइयरी में से ही किसी को कुछ भी पोस्ट या शेयर करने योग्य कुछ नही मिला भगत सिंह फाँसी पर चढ़कर देश को अपनी कुर्बानी का संदेश नही देना चाहते थे बल्कि कुर्बानी के ज़रिए वो अपने विचारो को देश के लोगो तक पहुँचाना चाहते थे पर शायद हमने भगत सिंह के आदर्श भारत के सपने को पूरा कर दिया है इसलिए हमे अब उनके विचारो की ज़रूरत नही है, क्रांतिकारी के साथ साथ भगत सिंह एक महान विचारक भी थे, पर हमने उनकी छवि को देश पे कुर्बान होने वाले दीवाने युवक की तक सीमित रखना ठीक समझा, वो इंसान कितना महान होगा जिसने लोगो को कुछ समझाने के लिए अपनी मौत को चुना पर हम ऐसे इंसान की किसी भी बात का अनुसरण करने की बजाए उसकी शाहादत का एहसान फ़ेसबुक के लाइक से चुका रहे हैं| मुझे लगता है जिस इंसान ने मौत को भी मुस्कुराते हुए गले लगाया आज ये सब देखकर उसकी आँखे नम होंगी|

“Mostly the quality of your life depends on the quantity of the efforts you make for it” – Indrajeet Dixit

Quote  —  Posted: March 21, 2014 in Uncategorized

बड़े दिनो के बाद आज लिखने का मौका मिला है या कहूँ खुद को लिखने का मौका दिया है इतने दिनो में इतना कुछ हो गया की समझ नही आ रहा है की किसपे पहले लिखू , कुछ अंतरद्वन्द के चलते एक ब्रेक लेने का सोचा, विचार और विचारधारा में मतभेद होने लगे तो ये किसी रोग से कम नही, अपने इन अंतरद्वन्द को ख़त्म करने के लिए एक ब्रेक ले लिया, ब्रेक के दौरान ब्रेक अप भी हुआ पर गर्लफ्रेंड से नही,  किससे!!! ये दर्द तो लिखते-लिखते कहीं ना कहीं झलक ही आएगा…. खैर अभी आया हूँ, गुस्से में चेहरा लाल करके,  इंटरनेट लगवाने की मशक्कत करके | सरकारी कंपनी एम टी एन एल का इंटरनेट लगवाने के लिए पिछले तीन महीनो से परेशान होने के बाद आख़िरकार एक सरकारी कर्मचारी ने जिनकी ड्यूटी घर से आकर दस्तावेज कलेक्ट करने की है मुझे घर से 11 किलोमीटर दूर बुलवाया | 3 महीने पहले एक और साहब घर आए थे डॉक्युमेंट्स पूरा ना होने की दुहाई देकर कनेक्शन की फीस के साथ 500 रुपय का नज़राना माँग गये थे, रिश्वत को मैने नज़राना क्यूँ कहा आप आगे समझ जाएँगे, सोचा ईमानदारी से डॉक्युमेंट्स पूरा करके कनेक्शन लगवाएँगे | 3 महीनो में डॉक्युमेंट्स पूरा करने, दफ़्तरों के कई चक्कर लगाने और इतनी दौड़-भाग करने के बाद भी एफेडेविट बनवाने के नाम पर वो महा-पुरुष 300 रुपय ले ही गये, मेरी बातो से जनाब समझ गये थे की मैं रिश्वत नही दे सकूँगा तो उन्होने बीच का रास्ता निकाला 100 रुपय के एफेडेविट की ज़रूरत बताकर 300 रुपय ले गये मुझे भी पता था की मैं खुद से ही धोखा कर रहा हूँ ईमानदारी के अपने सिद्धांत को आवश्यकता की मजबूरी के नाम बेच रहा हूँ पर मैं हारा हुआ था 3 महीने की परेशानी से नही उस आदमी की मानसिकता से, डॉक्युमेंट भरते-भरते सज्जन ने मुझे बताया की रिश्वत तीन प्रकार की होती है, नज़राना, शुक्राना और जबराना मतलब रिश्वत जबरन नही माँगी जानी चाईए पर काम के हो जाने पर शुक्रिया के तौर पर या काम होने से पहले उपहार के तौर पर दी जानी चाईए| साथ मुझे ये भी नसीहत दे रहे थे कितना आसान है रिश्वत देकर ज़िंदगी जीना जहाँ 100-200 से काम बनता हो वहाँ पर बेवजह ईमानदार नही बनना चाईए| मैं सोच में पड़ गया की हम सब कैसे समाज हैं बेवजह कुछ लोग कहते है की देश भ्रष्टाचार से परेशान है यहाँ तो भ्रष्टाचार के पक्ष में तर्क दिए जा रहे है उसकी व्याख्या हो रही है| हम सब उपभोक्ता ही होते हैं, अफसर या कर्मचारी सिर्फ़ एक ही दफ्तर में रहते हैं बाकी हर जगह टेबल के इस तरफ ही रहते हैं| ये आदमी जो मुझसे रिश्वत लेकर गया है कल खुद कहीं पर रिश्वत देने को मजबूर होगा, पता नही उस वक्त भ्रष्टाचार के प्रति इसका इतना सकरात्मक रवैया होगा या नही, उस आदमी से मुझे कोई परेशानी नही, हम में से ज़्यादातर लोग दिन भर  इसी तरह काम करते हैं फिर शाम को घर पहुँचकर टीवी की मनोरंजक डिबेट देखकर तय करते हैं की कौन सा नेता ज्यादा ईमानदार है, अपना किया हुआ भ्रष्टाचार हमे कभी अपराध नही लगता, उसे करते हुए हम अपने को मजबूर मान लेते है| खुद जो थोड़ा अच्छा कर सकते हैं वो नही करते, तंत्र की मजबूरी की दलील देते फिरते हैं, नेताओ को गाली देने का कोई मौका नही छोड़ते | खैर ये सब भड़ास  है 300 रुपय में ईमानदारी बेचकर आया हूँ| नफा – नुकसान तो लगा ही सकता हूँ…

एक बार फिर साबित हुआ की भैंसो में बिल्कुल अक्ल नही होती, अगर होती तो यू.पी सरकार के कैबिनेट मंत्री आजम खान की मासूम भैंसे यूँ ना भागती,  उन भैंसो को कहाँ पता था की वो सिर्फ़ भैंसे नही हैं आजम खान की भैंसे है, भागेंगी तो उनके पीछे पूरी यूपी पुलिस भागेगी,  भैंसो को कहाँ पता था की वो 3 पुलिस वालो को सस्पेंड भी कर सकती है,  2 को लाइन हाजिर भी करवा देंगी, आनन फानन में कसाई खानो में छापे मारे गये , इस दौरान 10 लोग गिरफ्तार भी कर लिए गये, खोजी कुत्तो को जिस तेजी से हरकत में लाया गया उससे उन्हे लगा की किसी बम की तलाश करना है,  खैर कुत्ते चतुर होते हैं जल्द समझ गये की मामला ज़्यादा गंभीर है वैसे भैंसे मिल गयीं और  अच्छा ही हुआ मिल गयीं,  यू.पी पुलिस से ना ढूंढी जाती तो आज़म  खान केंद्र सरकार से सी.बी.आइ को भी इस काम में लगाने की माँग कर सकत थे,  समाजवादी पार्टी के बाहरी समर्थन से सरकार चला रही कॉंग्रेस गठबंधन धर्म की मजबूरी में इतना तो  करती ही पर विपक्षी इसका विरोध करते, इतने सारे बेअकली के काम होते ये सोच भैंसो ने ही अक्ल लगा ली, देश हित में भैंसो ने आत्म-समर्पण करना ही अक्ल का काम समझा,  खास बात है की भैंसो के मिलने  से जुड़ी कोई भी जानकारी पुलिस देना नही चाहती हो सकता है  यू.पी पुलिस को ये मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा लग रहा हो, वैसे इस बात की जाँच होनी चाहिए की भैंसे कैसे भागी और जाँच इस बात की भी होनी चाहिए की ऐसे नेताओं की शर्म कहाँ भाग गयी है,  जनाब आज़म ख़ान ने इस सारे मामले में बेशर्मी की हद कर दी और मामला खत्म होने पे तो वो हद भी पार कर दी, नेताजी कहतें है उनकी भैंसे इंग्लेंड की महारानी विक्टोरीया से भी ज्यादा पॉपुलर हो गयी हैं, अरे नेता जी जिस महारानी की आप बात कर रहे हो उन्हे तो मरे हुए 113 साल हो चुके हैं और आज पॉपुलर आपकी बेशर्मी हुई है भैंसे नही आपके  राज्य में 2013 में ही 2066 बच्चे 2091 महिलाए और 3935 आदमी लापता  हुए  है,  जरा उनकी भी कभी सुध लो, कितनी ही माँ रोती हैं की उनका बेटा किस हाल में होगा, कितने ही बाप सोचते हैं की ना जाने उनकी बेटी किस बाजार में बेच दी गयी  और आप अपनी भैंसो के सहारे अपनी तानाशाही का भद्दा प्रदर्शन करते हो,  नेता हो नेतृत्व करो बेशर्मी नही,  भैंसे भागने पर पुलिस वालो को सस्पेंड करवा देते हो, कहीं बेटी….. ऊप्स,  खैर आपकी भैंसे शर्म के मारे भागी  होंगी, वो आपके वोटर जितनी बेवकूफ़ नही थी,  उनको आपके फ्री लॅपटॉप का लालच नही  था,  ना उनको अपने तबेले से अपना तबादला किसी  अच्छे तबेले में कराना था, वो आपकी वोट बैंक भी नही थी, नेता जी आपकी गुलामी में इंसान ही अच्छे लगते हैं उनको ही बाँध के रख लीजिए,  अभी सिर्फ़ भैंस भागी है,  कहीं वोटर भी  पुलिस से ना ढुंढ़वाना पड़े…

 हिंगलिश अनुवाद

 Ek baar fir saabit ho gya ki bhainso mein bilkul akal nahi hoti agar hoti to  U.P sarkar ke kendriya mantri azam khan kli bhainse u na bhagti, bechari bhainso ko kahan pta tha ki wo sirf bhainse nahi hain azam khan ki bhainse hai, bhagengi to unke peeche poori U.P police bhagegi, bhainso ko kahan pta tha ki wo teen police walo ko suspend bhi kara sakti hain 2 ko line hajir bhi karwa dengi, aanan faanan mein  mein kasai khano mein chaape mare gaye, 10 logo ko giraftar bhi kar liya gya, jis teji ke sath khoji kutto ko kaanm pe lgaya gya, unhe lga ki kisi bomb ki talash karni hai, par kutte chatur hote hai jald samajh gaye mamla zyada serious hai. Waise bhainse mil gayi aur achha hi hua ki mil gayi na milti to azam khan kendr sarkar se C.B.I ko bhi is kaam mein lagane ki maang karte, samajwadi party ke support se center mein sarkar chala rahi congress majboori mein itna to karti hi, par opposition iska virodh karte, bewajah itne saare beakli ke kaam hote ye soch bhainso ne hi akal lga li aur deshhit mein aatm-samarparn karna hi akal ka kaam samjha,khaas baat ye hai ki U.P police is bhainso ke milne se judi koi bhi jankaari nahi dena chahti ho sakta hai U.P police ko ye mamal rashtriya suraksha se juda lag rha ho, waise is baat ki jaanch honi chaiye ki bhainse kaise bhaagi aur jaanch is baat ki bhi honi chaiye ki aise netao ki shram kahan bhag gayi hai, janab azam khan ne is poore mamle mein besharmi ki hadd kar di aur mamla khatam hone par to wo had bhi paar kar di, netaji kehtein hai unki bhainse England ki maharani Victoria se bhi popular ho gayi hain, arre netaji jin maharani ki aap baat kar rahe ho unhe to mare 113 saal ho chuke hain aur aaj popular aapki besharmi hui hai bhainse nahi. Aapke rajya mein hi akele 2013 mein 2066 bachhe, 2091 aurtein aur 3935 aadmi laapata hue hain kabhi un ki bhi sudh lo, kitni hi maa roti hain ki unka beta kis haal mein hoga, kitne hi baap sochtein hain ki na jane unki beti kis bazaar mein bech di gayi aur aap apni bhainso ke sahare apni tanashahi ka bhadda pradarshan karte ho neta ho netritv karo besharmi nahi, bhains bhaag jaane par police suspend kar dete ho kahin beti…. Oops. khair aapki bhainse sharm ke mare bhag gayi hongi, wo aapke voter ki tarah bewakoof nahi, unko aapke free laptop ka lalach bhi nahi tha, unko apna transfer apne tabele se kisi ache tabele mein  nahi karana tha, wo aapki vote bank bhi nahi thi, netaji aapki gulami mein insan hi ache lagte hain unko hi baandh ke rakh lijiye, abhi sirf bhainse bhaagi hain kahin voter bhi police se na dhundwana pade…

64 सालो से मनाते आ रहे हैं, आज फिर एक बार मना ही लेते हैं पब्लिक हौलीडे है, छुट्टी का दिन, कॉन्स्टिट्यूशन बनाने का काम बहुत सरदर्दी का था इतने थका देने वाले काम के 64 साल बाद भी एक छुट्टी तो बनती ही है, जो बन गया उसे हम कितना मानते है इसके उदाहरण साल भर पब्लिक प्रॉपर्टी को नुकसान पहुँचाते लोगो को देखकर तो मिल ही जाता है, बनाने वाले को नही पता था की 64 साल में 98 बार इसे अमेंड याने संशोधित किया जाएगा, इतनी बार अमेंड किया है तो एक अमेंडमेंट डे भी क्यूँ नही मना लेते, संविधान को हम सब मानते है पर असल में कितना जानते है ये आपको पता ही होगा, संविधान की मेरी अपनी समझ हाइ स्कूल में लगने वाली सोशल साइन्स की किताब की मिट चुकी यादों तक ही सीमित है, वैसे जानने की चाहत हो तो गूगल की गलीयों में कॉन्स्टिट्यूशन भी किसी पॉपुलर गाने की तरह डाउनलोड करने के लिए उपलब्ध है, भले ही कॉन्स्टिट्यूशन के कई आर्टिकल परस्परविरोधी हों, तेज़ी से विकसित होते देश में आज भी यूनिफॉर्म सिविल कोड ना आ पाया हो और भले ही संविधान बनने के 64 साल बाद भी समानता का अधिकार देने वाले आर्टिकल 14-19 ठीक तरह से लागू ना हो पायें हों, सरकारें कभी नही चाहती की आप इन सब बातों को लेकर परेशान हों इसलिए यदि इस दिन आपने अपने मित्रो या रिश्तेदारों के साथ किसी पार्क या पर्यटन स्थल में पिक्निक मानने के लिए खुद को बुक ना किया हो तो टीवी के सामने बैठकर 26 जनवरी की आकर्षक परेड का आनंद लें, शाम होते होते बॉलीवुड के किचन से 2-4 देशप्रेम और वीर-रस में डूबी फिल्में और राष्ट्र को समर्पित बॉलीवुड के रंगारंग नृत्य कार्यक्रम आपको परोस दिए जाएँगे| 26 जनवरी के पोसिटिव साइड के रूप में मुझे बचपन में स्कूल के झंडा फहराने के कार्यक्रम की याद आती है जिसमे निजी तौर पर मेरा पूरा ध्यान आखरी में मिलने वाली मिठाई पर हुआ करता था जिसकी जगह भी महंगाई और मिलावट के चलते टॉफी ने ले ली| खैर मेरा तो ब्लड ग्रुप और नज़रिया दोनो ही नेगेटिव है, कॉन्स्टिट्यूशन की अच्छी और पोसिटिव बातों के लिए आपको संविधान के स्थापना दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ….

जय हिंद


हिंगलिश संस्करण

 64 saalo se manate aa rahe hain aaj fir ek baar mna hi lete hain  public holiday hai, chutti ka din, constitution bnane ka kaam bhaut sardardi ka tha, itne thaka dene wale kaam ke 64 saal baad bhi ek chutti to banti hi hai, jo ban gya usko hum kitna mante hai iske udaharan saal bhar public property ko nuksan pahunchate logo ko dekhkar to mil hi jata hai, bnane wale ko nahi pta tha ki 64 saal mein 98 baar ise amend yane sanshodhit kiya jayega, itni baar amend kiya hai to ek amendment day bhi  kyun nahi mana lete, samvidhan ko hum sab mante hai par asal mein kitna jante hai ye aapko  pta hi hoga, samvidhan ki meri apni samajh high school mein lagne wali social science ki kitab ki mit chuki yaadon tak hi seemit hai, waise janne ki chahat ho to google ki galiyon mein constitution bhi kisi popular gaane ki tarah download karne ke liye uplabdh hai. bhale hi constitution ke kai articles self contradictory ho ya develop hote desh mein uniform civil code abhi tak lagu nahi hua ho ya bhale samvidhan banne ke 64 saal baad bhi samaanta ka adhikar dene wale article 14-19  theek tarah se lagu nahi ho payein ho sarkar kabhi nahi chahti ki aap in sari bato ko lekar pareshan ho isliye yadi aapne apne mitro ya rishtedaaro ke sath kisi park ya paryatan sthal mein picnic mnane ke liye khud ko book na kiya ho to tv ke samne baithkar 26 January ki parade ka anand le sham hote hote bollywood ke kitchen se 2-4 deshbhakti aur veer ras mein doobi filme aur rashtr ko samarpit bollywood ke nritya karaykrm apko paros diye jayenge. 26 jauary ke positive side ke roop mein mujhe bachpan mein school ke jhnda fehrane ke karykrm ki yaad aati hai jisme niji taur par mera poora dhyan aakhri mein milne wali mithai par hua karta tha par jiski jagah mehngai aur milawat ke chalte toffee  ne le li khair mera to blood group aur nazariya dono hi negativehain , constitution mein ki positive aur achhi baato  ke liye samvidhan ke sthapna diwas ki shubhkamnao ke sath…

Jai hind

आज से एक साल पहले तक 16 दिसंबर एक फिल्म के नाम, बांग्लादेश के जन्म या कुछ और ऐतिहासिक तथ्यों के लिए याद किया जाता होगा पर आज से एक साल पहले के 16 दिसंबर को दिल्ली में एक चलती बस में निर्भया नाम दी हुई लड़की के साथ बलात्कार हुआ जिसने सारे देश, व्यवस्था, सत्ता और हमारे समाज पर ही सवाल उठाए, इस घटना के बाद भारत और दुनिया भर में इसकी निंदा हुई, धरने हुए, प्रदर्शन हुए, संवेदना व्यक्त करने वाले कार्यक्रम हुए और ढेर सारे रेप भी हुए, 16 दिसंबर के बाद अकेले दिल्ली में हुए 1500 से ज़्यादा बलात्कारों को ना उतना मीडिया कवरेज मिला ना समाज का उतना आक्रोश उनके पक्ष में सामने आया| आँकड़े कहीं से नही बताते की निर्भया के बाद रेप की घटनाओं में दुनिया, देश या दिल्ली में ही कोई कमी आई हो तो क्या समाज की इतनी संवेदना, इतना आक्रोश समाज के ही काम नही आया, आया तो किस काम आया, एक साल में क्या बदला, क्या बदला सकता था और क्या बदलना चाहिए इस बात का विश्लेषण बहुत सारे स्तर पर तो हो ही रहा होगा, जब आँकड़े बताते हो की दो तिहाई बलात्कार पीड़िता के दोस्त या रिश्तेदार हो तो रेप की ज़िम्मेदारी का ठीकरा सिर्फ़ कमज़ोर पुलिस व्यवस्था के सिर फोड़ना किस हद तक जायज़ है, युवा खुद कितना ज़िम्मेदार हुआ है इसका अंदाजा रात के वक़्त रिहायशी इलाक़ो में काली फिल्म से सुसज्जित उनकी गाड़ी की रफ्तार से लगाया जा सकता है, पुलिस तो पहले भी बलात्कार की पीड़ित को ही बलात्कार का ज़िम्मेदार मानती थी आज भी ऐसा ही कुछ सोचती है| समाज के पढ़े-लिखे तबके में बॉलीवुड में, आई टी कंम्पनियों में, मीडिया समूहों में और लगभग हर जगह से महिलाओ के शोषण की बात प्रत्यक्ष रूप में या दबी ज़ुबान में सामने आती रही है तो कमज़ोर क़ानून, अशिक्षा, या सामाजिक मानसिकता इन सब के बीच आप रेप की ज़िम्मेदारी का बँटवारा अपने हिसाब से कीजिए वैसे आज 16 दिसंबर की उस घटना को 1 वर्ष पूरे हो गये हैं जगह-जगह पर निर्भया को श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही होगी, लोग भाषण दे रहे होंगे और मीडिया कवरेज दे रहा होगा, इतना कर रहे समाज से ये प्राथना की जब घर जाइए तो अपनी घर में रहने वाली स्त्री को सम्मान की नज़रों से देखिए, ताकि आने वाली पीढ़ी में कल किसी महिला को हवस की नज़रों से देखने वाली निगाहें ना हो.

 हिंगलिश संस्करण  Hinglish Sanskaran

Aaj se ek saal pehle tak 16 december ek movie ke naam, Bangladesh ke janm ya kuch aur atihasik tathyon ke liye yaad kiya jata hoga par aaj se ek saal pehle ke 16 december ko delhi mein ek chalti bus mein nirbhaya naam di hui ladki ke sath balatkar hua jisne sare desh, vyvastha, satta aur hamari samaj pe hi sawal uthaye, is ghatna ke baad bharat aur duniya bhar mein iski ninda hui, dharne hue, pradarshan hue, samvedna vyakt karne wale karaykram hue aur dher sare rape bhi hue, 16 december ke baad akele delhi mein hue 1500 se zyada balatkaro ko na utna media coverage mila aur na samaj ka utna aakrosh unke paksh mein saamne aaya. aankde kahin se nahi btate ki nirbhaya ke baad rape ki ghatnao mein duniya desh ya delhi mein hi koi kami aayi ho to kya samaj ka itna aakrosh, itni samvedna samaj ke hi kaam nahi aaya, aaya to kis kaam aaya, ek saal mein kya badla, kya badla sakta tha aur kya badalna chaiye is baat ka vishleshan bhaut saare star pe ho hi rha hoga, jb aankde btate ho ki do tihaayee balatkari peedita ke dost ya rishtedar ho to rape ki zimmedari ka theekra sirf kamzor police vyvastha ke sir phodna kis had tak jayaz hai iska aanklan aap swayam karein, yuva khud kitna zimmedar hua hai iska andaaza raat ke waqt rihayshee ilaqo mein kali film se susajjit unki gadi k raftaar se lagaya ja sakta hai, police to pehle bhi balatkar ki peedita ko hi balatkar ka zimmedar manti thi aaj bhi aisa hi kuch sochti hai samaj ke pade likhe tabke mein, bollywood mein, it companiyon mein, media groups mein aur lagbhag har jagah se mahilao ke soshan ke baat pratyaksh roop mein ya dabi mein saamne aati rahi hai to kamzor kanoon, ashiksha, ya samajik mansikta in sab ke beech aap rape ki zimmedari ka batwara apne hisab se kijiye waise aaj 16 december ki us ghatna ko 1 varsh poore ho gye hain jagah jagah par nirbhaya ko shradhanjli arpit ki ja rahi hogi, log bhashan de rahe honge aur media coverage de raha hoga, itna kr rahe samaj se ye prathna hai ki jab ghar jaiye to apni ghar mein rahne wali istri to saman roop se dekhiye, taki aane wali peedi mein kal kisi mahila ko hawas ki nazro se dekhne wali nigahein na ho.

राजनीति यूँ तो बदलती नही है पर जब बदलती है तो इसे बदलने वाले की ही सबसे पहले परीक्षा लेती है, कितना बड़ा घर बड़ा कहलाएगा और कितना छोटा काम के लिए छोटा पड़ जाएगा इस बात को तय करना जितना मुश्किल अरविंद केजरीवाल के लिए है उतना कभी किसी मुख्यमंत्री के लिए नही रहा | दिल्ली में ही दिल्ली से सटे एक प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री अपने लिए 48 कमरो का फ्लॅट अलॉट करवाती हैं, उत्तर प्रदेश में अपने घर का 86 करोड़ रुपयों से नवीनीकरण कराती हैं, पसंद आने से पहले 12 बार बाथरूम तुड़वाती हैं और फिर भी ग़रीब दलितों  मसीहा कहलाती हैं | अगर सहूलियत से काम करने के लिए 5 कमरो का घर और 5 कमरो का दफ़्तर मुख्यमंत्री के लिए आपको बड़ा लगता है तो 320 एकड़ में बने राष्ट्रपति भवन में कितना कम होता होगा या होना चाहिए आप खुद ही सोचिएगा, बड़े घर के छोटे मुद्दे ने उनके विरोधियों को कुछ बोलने का मौका तो दे ही दिया और ये ‘कुछ’ सिर्फ घर तक ही सीमित नही रहा, अरविंद ने कहा लालबत्ती नही लेंगे विपक्षियों ने लालबत्ती को गाड़ी माना, गाड़ी पे लगी बीकन लाइट को नही, कल को विपक्ष उन्हे गाड़ी के ब्रांड, कलर, टॉप एंड मॉडल या बेसिक मॉडल आदि इत्यादि जैसे मुद्दो पर भी घेर सकता है, वो मॅनिफेस्टो जो चुनाव के बाद पार्टीयों की भूली बातें और जनता के अधूरे सपनो की तरह होता था अचानक ही इतना महत्वपूर्ण और पेंचीदा हो गया की अब से पार्टियाँ इसे लीगल राइटर से लिखाया करेंगी और विपक्षीयों के हमलो से बचने के लिए घर लेंगे या नही लेंगे, बड़ा लेंगे तो कितना बड़ा छोटा तो कितना छोटा, दीवारो के रंग सब बता दिया करेंगी, फिलहाल तो बड़े घर का मसला बढ़ते बढ़ते इतना बड़ा हो गया की अरविंद केजरीवाल ने उस तथाकथित बड़े घर को लेने से ही मना कर दिया है, अब सरकार उनके लिए नया घर ढूँढ रही है और विरोधी नया मुद्दा वैसे जाते जाते एक बात- बड़े दिल वाली दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को छोटा घर मिले ना मिले लोगो के दिलो में उन्हे जगह तो मिल ही गयी है.


हिंगलिश संस्करण Hinglish Sanskaran

Rajniti  yun to badalti nahi hai par jab badalti hai to ise badalne wale ki hi sabse pehle pareeksha  leti hai, kitna bada ghar bada kehlayega aur kitna chota kaam ke liye chota pad jayega is baat to tay krna jitna mushkil arvind kejriwal ke liye hai utna kabhi kisi mukhymantri ke liye nahi raha. Dilli mein hi dilli se sate ek Pradesh ki poorv mukhymantri apne liye 48 kamro ka flat allot karwati hain, U.P mein apne ghar ka 86 crore rupay se naveenikaran krati hain, pasand aane se pehle 12 baar bathroom tudwati hain aur phir bhi garib dalito ki maseeha kehlati hain. Agar sahooliyat se kaam karne ke liye 5 kamro ka ghar aur 5 kamro ka daftar mukhyamantri ke liye apko bada lagta hai to 320 ekad mein bane rashtrpati bhawan mein kitna kam hota hoga ya hona chaiye aap khud hi sochiyega, bde ghr ke chote mudde ne unke virodhiyon ko kuch bolne ka mauka to de hi diya aur ye ‘kuch’ sirf ghar tak hi seemit nahi raha, arvind ne kaha laalbatti nahi lenge vipakshiyon ne laalbatti ko gadi mana, gadi pe lagi beacon light ko nahi, kal ko vipaksh unhe gadi ke brand, color, top model ya basic model aadi ityadi jaise muddo pe bhi gher sakta hai, wo manifesto jo chunav ke baad partiyon ki bhooli baatein aur janta ke adhhore sapno ki tarah hota tha achanak hi itna mahatvapoorn aur pecheeda ho gya ki ab se partiyaan ise legal writer se likhaya karengi aur vipakshiyon ke hamlo se bachne ke liye ghar lenge ya nahi lenge, bda lenge to kitna bda chota to kitna chota, deewaro ke rang vagera vagera sab bta diya karengi filhaal to bade ghar ka masla badte badte itna bada hogya ki arvind kejriwal ne us tathakathit bada ghar lene se hi mna kar diya hai, ab sarkar unke liye naya ghr dhoond rahi hai aur vipaksh naya mudda waise jate jate ek baat-  bade dil wali dilli mein arvind kejriwal ko chota ghr mile na mile logo ke dilo mein unhe jagah to mil hi gayi hai.

जब दुनिया में आया भी ना था, माँ तब से है तुझसे नाता |
तेरी ममता में माँ, ईश्वर नज़र है मुझको आता ||
तुझसे ही मैने माँ, दुनिया का पहला रिश्ता पाया |
जब मैने शब्दो को सीखा, तो पहला शब्द माँ ही आया ||
देखे बिना ही माँ मुझको, तूने इतना प्यार किया |
कितने दर्द सह के माँ, तूने मुझको जन्म दिया ||
पहली बार जब आँखें खोली, आँचल में तेरे माँ खुद को पाया |
तेरे पहले उस स्पर्श से, प्यार क्या है माँ समझ ये आया ||
प्यारे हाथों से तूने अपने, खाना मुझे खिलाया  माँ |
डगमगातें कदमों को मेरे, चलना तूने सिखाया माँ ||
कभी जो बीमार हुआ मैं, माँ कितना ज़्यादा रोई तू |
मेरी उन नींदो के लिए, माँ कितनी राते ना सोई तू ||
छोटी बड़ी ग़लतियों को माँ, हमेशा माफ करती तू |
जो कोई कभी मुझे डाँटता, माँ उनसे कितना लड़ती तू ||
अब में कुछ बड़ा हो गया माँ, तुझसे कुछ दूर हो गया माँ |
बेमतलब की दुनिया में, थोड़ा सा कहीं खो गया माँ ||
इस दुनिया में माँ खोके भी, दूर तुझसे होके भी |
याद तुझे माँ करता हूँ, कभी हसके कभी रोके भी ||
पर आँसू मेरे पोंछेगा कौन, ये सोचके माँ में रोता नही |
वो नींद मुझे अब आएगी कैसे, तेरा हाथ जो सर पर होता नही ||
चाहे में रहूं कहीं भी माँ, याद बहुत आती है तेरी |
प्यार तुझे बहुत करता हूँ, कैसे बताऊँ तुझे ओ माँ मेरी ||
तेरी छाया रहे हमेशा, माँ ज़िंदगी की धूप में |
क्योंकि इस दुनिया में ईश्वर मेरा, है माँ तेरे रूप में ||

Jab duniya mein aaya bhi na tha, maa tab se hai tujhse naata,
teri mamta mein maa, ishwar nazar hai mujhko aata.
Tujhse hi maine maa, duniya ka Pehla rishta paaya,
Jab maine shabdo ko seekha, to pehla shbd maa hi aaya.
Dekhe bina hi maa mujhe, tune mujhse pyar kiya,
Kitne dard sahke maa, tune mujhko janam diya.
pehli bar jab aankhein kholi, aanchal mein tere maa khud ko paaya,
tere pehle us sparsh se, pyar kya hai maa samajh ye aaya.
Pyaare haanto se tune apne, khana mujhe khilaya  maa,
dagmate kadmo ko mere chlna tune sikhaya maa.
kbhi jo bimar hua mein, maa kitna zyada royi tu,
meri un neendo ke liye, maa kitni raatein na soyi tu.
Choti badi galtiyo ko hamesha maaf krti tu,
Jo koi kabhi mujhe daanta, unse kitna ladti tu.
Ab mein kuch bda ho gya maa, tujhse kuch dur ho gya maa,
Bematlab ki duniya mein, thoda sa kahin kho gya maa.
Is duniya mein maa khoke bhi, dur tujhse hoke bhi,
Yaad tujhe maa krta hu, kabhi haske kabhi roke bhi.
Par aansu mere ponchega kaun ye sochke maa mein rota nahi,
Wo neend mujhe ab aayegi kahan, tera hath jo sar pe hota nhi.
Chahe mein rahu kahin bhi, yaad maa bhaut aati hai teri,
Pyar tujhe bhaut karta hu kaise btau tujhe  o maa meri.
Teri chaya rahe hamesha, maa zindgi ki  dhoop mein,
Kyunki Is duniya mein ishwar mera, hai  maa tere roop mein.


किसी शहर की आधुनिकता, उसकी तरक़्क़ी का अंदाज़ा उसकी उँची-उँची इमारतों को देख के लगाया जा सकता है या कहें अक्सर ऐसे ही लगाया जाता है| पेड़ – पौधे काट के, प्रकृति का सारा सौन्दर्य नष्ट करके हमने कॉंक्रीट के अंतहीन से लगने वाले जंगलों का निर्माण किया और उसे ही तरक़्क़ी का मापदंड बनाया| वैसे सच भी है ये उँची-उँची इमारतें अपने साथ लाखो रोज़गार लाती है| नौकरी और अच्छी तनख़्वा के साथ साथ ये आपके लिए माल, पब, क्लब्स, रेस्टोरेंट्स, थियेटर्स आदि जैसी इतनी सुख सुविधाओ लाती है की पेड़ की ठंडी छाया की ज़रूरत आपको पड़ेगी ही क्यूँ| जब आपकी कंपनी ने ऑफीस में एसी लगवाया है तो बाहर पेड़ है या नही इसकी चिंता आप क्यूँ करें, ऑटो-रिक्शा की जगह भी अब एसी कॅब ने ले ली है बस गाड़ी का काँच नीचे करके सफ़र मत करिएगा दमा सिर्फ़ सिगरेट से नही होता| शहर  की भीड़ भाड़ में घूमते हुए कभी प्रकृति का आनंद लेने का मन हो ही जाए तो किसी रेस्टोरेंट या माल में झाँक लीजिएगा आजकल प्रकृति रेस्टोरेंट की थीम के रूप में काफ़ी चलन में है, असली नेचर तो अब सिर्फ़ नेचर पार्क तक ही सीमित रह गया है और अगर उसकी ज़मीन भी सरकार किसी उद्योगपति को अलॉट कर दे और वहाँ पर भी कोई इमारत बन जाए तो भी चिंता ना करें, जब तक देश के नेता अमर नही होते उनकी याद में पार्क तो बनते ही रहेंगे पेड़ क्या होते हैं बच्चो को वहाँ जाकर दिखा सकते है, नदियाँ सूख भी जायें तो परेशान ना हो रोज़ नये वॉटर पार्क तो बन ही रहें है, बाथरूम के शावर का उपयोग बच्चो को बारिश समझाने के लिए कर सकते हैं, नदी के किनारे तभी जायें जब उन्हे नालो का मतलब समझाना हो| सब नष्ट भी हो गया तो भी आप अपनी लाइफ में मस्त रहिएगा एन्वाइरन्मेंटल साइन्स के लिए कुछ नही भी बचा तो प्रकृति का ज़िक्र इतिहास की किताबों में तो मिल ही जाएगा, और हम साँस कैसे लेंगे इसकी फिक़्र बिल्कुल ना करें,  दिन ब दिन स्मार्ट होते स्मार्ट फोन में साँस लेने के लिए कोई ना कोई सॉफ्टवेर तो आ ही जाएगा, और जब इतने सुख सुविधाओ से भरे आज के जीवन में हमें चैन की साँस लेने की फ़ुर्सत नही है तो आने वाली पीढ़ी को तो उसकी ज़रूरत भी नही होगी और ना ज़रूरत होगी नष्ट होते इन खूबसूरत पेड़ो की…